‘बिना संशोधन’ लोकपाल को नियुक्त किया जाए : सुप्रीम कोर्ट

लोकपाल की नियुक्ति का मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है. लोकपाल एक्ट पर बिना संशोधन के ही काम किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि केंद्र के पास इसका कोई जस्टिफिकेशन नहीं है कि इतने वक्त तक लोकपाल की नियुक्ति को सस्पेंशन में क्यों रखा गया है.

बता दें कि 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था. केंद्र सरकार की ओर से AG मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि लोकपाल की नियुक्ति वर्तमान हालात में  संभव नहीं है. लोकपाल बिल में कई सारे संशोधन होने हैं जो संसद में लंबित हैं. मल्लिकार्जुन खडगे नेता विपक्ष नहीं हैं. कांग्रेस ने नेता विपक्ष का दर्जा मांगा था लेकिन स्पीकर ने खारिज कर दिया. इससे पहले भी ऐसा हुआ है जब संसद में नेता विपक्ष ना हो. इस संबंध में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को शामिल करने संबंधी संशोधन मॉनसून सत्र में पास होने की उम्मीद है.

ये मामला न्यायपालिका में नियुक्ति का नहीं है बल्कि लोकपाल की नियुक्ति का है. न्यायपालिका को अधिकारों के बंटवारे का सम्मान करना चाहिए और संसद को ये निर्देश जारी नहीं करने चाहिए कि लोकपाल की नियुक्ति करे. ये संसद की बुद्धिमता पर निर्भर है कि वो बिल पास करे. संसद में लोकपाल बिल में करीब 20 संशोधन लंबित हैं. लोकपाल बिल में 2014 में संशोधन प्रस्ताव लाया गया था लेकिन स्टैंडिंग कमेटी ने एक साल ले लिया था

सुप्रीम कोर्ट में लोकपाल की नियुक्ति को लेकर दाखिल याचिका पर अहम् सुनवाई हुई थी.  पिछली सुनवाई में केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि लोकपाल की नियुक्ति को लेकर लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल को नेता प्रतिपक्ष करार देना ही एकमात्र मसला नहीं है. सरकार ने कहा कि इसकेअलावा भी कुछ अन्य मसले हैं. केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया था कि इस मसले पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट पर गौर कर रही है. जिस पर कोर्ट ने कहा था कि हम यह जानना चाहते हैं कि सरकार लोकपाल कानून में क्या बदलाव लाना चाहती है.

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने बताया था कि लोकपाल की नियुक्ति में सिर्फ नेता प्रतिपक्ष का ही मसला ही रोड़ा नहीं है. संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है. रिपोर्ट में भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं के लिए एकीकृत ढांचे की सिफारिश की है. रिपोर्ट में केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को लोकपाल के साथ एकीकृत करने की सिफारिश की गई है.

कोर्ट कॉमन काउज नाम गैर सरकारी संगठन द्वारा जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने कहा कि अदालत को इस मामले में दखल देना चाहिए और सबसे बड़े विपक्षी दल को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दे देना चाहिए. लोकपाल की नियुक्ति के लिए सरकार दिलचस्पी नहीं ले रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझकर संशोधन विधेयक को रोक रखा है. वहीं दूसरी तरफ, सीबीआई प्रमुख, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और केंद्रीय सूचना आयुक्त की नियुक्ति के मामले में सबसे बड़े विपक्षी दल केनेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दे दिया गया है. शांति भूषण ने कहा कि लोकपाल विधेयक वर्ष 2013 में पारित हो गया था और वर्ष 2014 में प्रभावी हो गया था बावजूद इसकेअब तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो सकी है.

मालूम हो कि लोकपाल की चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष केनेता, भारत के प्रधान न्यायाधीश या नामित सुप्रीम कोर्ट के जज और एक नामचीन हस्ती के होने का प्रावधान है.

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