साहित्‍य उत्‍सव में गुलज़ार साहब बोले, ‘मुझे उन कुर्सियों पर बैठने से डर लगता है, जिन पर बैठने से…

'उबलती हांडिया इतनी, सभी में जिंदगी उबलती है, लेकिन न पकती है न गलती है ये जिंदगी यूं ही चलती है.' जाने – माने गीतकार गुलज़ार साहब ने इस अनोखे अंदाज में दसवें जयपुर साहित्‍य उत्‍सव की शुरूआत की.

डिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में जब गुलज़ार साहब ने अपनी खलिश भरी आवाज़ में बोलना शुरू किया तो वो पल थम-सा गया. गुलज़ार ने कहा, कि 'तकरीर करना मुझे सबसे भारी काम लगता है, अब तक मैं अपनी नज्‍़म सुनाकर चला जाता था, मगर इस बार आयोजकों ने मुझे नोट स्पीकर बना दिया है.'

गुलज़ार साहब ने लेखक बनने की चाहत रखने वालों को संबोधित करते हुए कहा, कि 'यह खुद से पूछना बहुत महत्वपूर्ण है, कि कोई क्यों लिखता है. क्या आप आत्मसंतोष के लिए लिख रहे हैं या खुद के लिए या फिर समाज को मूर्ख बनाने के लिए लिख रहे हैं. समाज की संपूर्ण अंतरात्मा को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है'.

गुलज़ार साहब ने साहित्‍य उत्‍सव में अपनी परेशानी को बयां करते हुए कहा, कि 'मुझे उन कुर्सियों पर बैठने से डर लगता है, जिन पर बैठने से पांव जमीन पर नहीं लगते हैं. फूल चाहे कितनी भी ऊंची टहनी पर लग जाएं, मगर मिट्टी से जुड़ा रहता है तभी खिलता है.’ फिर कहा, कि ‘जब तक पांव मैले नहीं हों, तब तक कलम भी स्याही चखना बंद कर देती है. सियासत मैं समझता नहीं हूं, मगर आम आदमी की तरह प्रभावित जरूर करती है.'

साथ ही उन्होंने साहित्‍य उत्‍सव समारोह के आयोजकों को उनके 'अथक' कार्य के लिए प्रशंसा करते हुए कहा, कि युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने में साहित्य उत्सव का 'बड़ा योगदान' है.

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