जीएसटी के लागू होने की कहानी….

नई दिल्ली :  सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है।
नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि।

पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले।

प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है।

कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कहना हैं कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में उनकी भी भूमिका थी

लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी।

जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता।

और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

 

 

 

 

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